October 10, 2026

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MP में OBC आरक्षण 27% पर क्यों लगा ब्रेक? हाईकोर्ट के 159 पेज के फैसले में सामने आईं 5 बड़ी वजहें

 

 जबलपुर
 मध्य प्रदेश में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) का आरक्षण 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने की कानूनी लड़ाई में हाई कोर्ट ने संवैधानिक प्रावधानों, सामाजिक पिछड़ेपन, सरकारी नौकरियों में प्रतिनिधित्व और आरक्षण बढ़ाने के लिए पेश किए गए आंकड़ों सहित कई अहम पहलुओं पर विचार किया। अदालत के 159 पृष्ठों के आदेश में स्पष्ट हुआ कि किसी वर्ग को आरक्षण देने का अधिकार और आरक्षण का प्रतिशत बढ़ाने का औचित्य दो अलग-अलग सवाल हैं। इन्हीं कसौटियों पर 27 प्रतिशत आरक्षण को उचित ठहराने के लिए प्रस्तुत आधारों की समीक्षा की गई।

मामले में याचिकाकर्ताओं ने संवैधानिक सीमा का हवाला देते हुए आरक्षण बढ़ाने के निर्णय को चुनौती दी, जबकि राज्य सरकार और आरक्षण समर्थकों ने सामाजिक न्याय, पिछड़े वर्गों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व तथा राज्य के नीतिगत अधिकारों के पक्ष में दलीलें रखीं। अंततः हाई कोर्ट ने 14 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था कायम रखी और नियुक्तियों से जुड़े मामलों में भी निर्देश दिए।

आरक्षण की 50 प्रतिशत सीमा बनी प्रमुख आधार
27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण का विरोध करने वाले याचिकाकर्ताओं की प्रमुख दलील थी कि इससे अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए कुल आरक्षण 63 प्रतिशत हो जाता है। आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण को भी जोड़ने पर कुल आरक्षण का अनुपात और बढ़ जाता है।

याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट के इंद्रा साहनी मामले का हवाला देते हुए कहा कि सामान्य परिस्थितियों में आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिए। इससे आगे बढ़ने के लिए असाधारण परिस्थितियों और ठोस संवैधानिक आधार का होना जरूरी है। केवल किसी वर्ग की आबादी अधिक होने के आधार पर आरक्षण का प्रतिशत बढ़ाना पर्याप्त नहीं है।

सरकार ने सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व का दिया तर्क
राज्य सरकार ने 27 प्रतिशत आरक्षण के फैसले का बचाव करते हुए ओबीसी वर्ग की सामाजिक स्थिति और सरकारी सेवाओं में उसकी भागीदारी को आधार बनाया। सरकार का पक्ष था कि पिछड़े वर्गों को पर्याप्त अवसर उपलब्ध कराने के लिए आरक्षण की व्यवस्था जरूरी है और इसके निर्धारण में राज्य की नीतिगत भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

ईडब्ल्यूएस आरक्षण को लेकर भी संवैधानिक प्रावधानों का हवाला दिया गया। सरकार की ओर से तर्क रखा गया कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए आरक्षण संविधान के अनुच्छेद 15(6) और 16(6) के तहत दिया गया है। इसलिए इसकी संवैधानिक स्थिति का परीक्षण अन्य आरक्षण प्रावधानों से जुड़े सवालों के समान आधार पर नहीं किया जाना चाहिए। वर्ष 2021 में हाई कोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान राज्य के महाधिवक्ता ने भी सरकार का पक्ष रखा था।

भाजपा सरकार से पूछा सवाल

चौधरी ने मध्यप्रदेश के सीएम और भाजपा सरकार से सवाल पूछा है कि वर्षों से सत्ता में रहने के बावजूद सरकार OBC के 27% आरक्षण के पक्ष में मजबूत कानूनी आधार क्यों नहीं तैयार कर सकी? अगस्त 2025 में सर्वदलीय बैठक में 27% आरक्षण के समर्थन पर सहमति बनी थी, तो उस सहमति को कानूनी परिणाम में बदलने के लिए क्या ठोस कदम उठाए गए? जिन युवाओं ने परीक्षाएं दीं, मेहनत की और वर्षों तक नियुक्तियों का इंतजार किया, उनके भविष्य की जवाबदेही कौन लेगा?

समीक्षा करें सरकार
OBC आरक्षण कोई राजनीतिक एहसान नहीं, सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व का सवाल है। सरकार को अब बयानबाजी से आगे बढ़कर फैसले के कानूनी पहलुओं की समीक्षा करनी चाहिए, उपलब्ध वैधानिक विकल्पों पर प्रभावी कार्रवाई करनी चाहिए और लंबित भर्तियों पर स्पष्ट समयबद्ध कार्ययोजना जनता के सामने रखनी चाहिए। OBC को केवल आश्वासन नहीं, अधिकारों की प्रभावी पैरवी चाहिए। युवाओं को भाषण नहीं, अपने भविष्य का जवाब चाहिए।

ओबीसी मुद्दे पर क्या बोली एमपी कांग्रेस
इधर, मध्यप्रदेश कांग्रेस ने सोशल मीडिया हैंडल एक्स पर कहा है कि मध्यप्रदेश में भाजपा सरकारों की मंशा और ओबीसी आरक्षण को लेकर उनकी भूमिका पर लगातार सवाल उठते रहे हैं। सरकार की कमजोर पैरवी और आधी-अधूरी जानकारी प्रस्तुत किए जाने के मुद्दे पर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी जी ने 8 अक्टूबर 2025 को दिल्ल्ली में वरिष्ठ अधिवक्ताओं से मुलाकात की थी और सरकार को समय रहते चेताया था। लेकिन, सरकार नहीं जागी और आखिरकार 27% ओबीसी आरक्षण को लेकर माननीय हाईकोर्ट का फैसला सामने आया। ओबीसी समाज के अधिकारों की रक्षा में सरकार की विफलता ने भाजपा की नीयत और कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब प्रदेश की जनता जवाब चाहती है। ओबीसी समाज को उसका संवैधानिक अधिकार दिलाने के लिए सरकार ने समय रहते ठोस कदम क्यों नहीं उठाए?

आरक्षण समर्थकों ने पिछड़ेपन और अवसरों पर दिया जोर
27 प्रतिशत आरक्षण के समर्थन में पक्षकारों ने दलील दी कि ओबीसी वर्ग की सामाजिक एवं शैक्षणिक स्थिति और सरकारी सेवाओं में उसकी भागीदारी का आकलन किए बिना आरक्षण का प्रतिशत तय नहीं किया जा सकता।

उनका कहना था कि सामाजिक न्याय की संवैधानिक व्यवस्था का उद्देश्य केवल सभी को समान अवसर देने की औपचारिक घोषणा करना नहीं, बल्कि ऐतिहासिक रूप से पिछड़े वर्गों को वास्तविक अवसर उपलब्ध कराना भी है। आरक्षण समर्थकों ने इसी आधार पर राज्य सरकार के निर्णय को उचित ठहराने का प्रयास किया।

पुरानी रिपोर्ट और आंकड़ों की विश्वसनीयता पर सवाल
मामले में आरक्षण बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किए गए आंकड़ों और आयोगों की रिपोर्ट की प्रासंगिकता भी अहम मुद्दा बनी। वर्ष 2019 के निर्णय में वर्ष 1983 की महाजन आयोग रिपोर्ट पर निर्भरता को लेकर सवाल उठे। याचिकाकर्ताओं की ओर से पुरानी रिपोर्ट के आधार पर आरक्षण बढ़ाने के औचित्य पर प्रश्न खड़े किए गए।

राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग से परामर्श नहीं किए जाने का मुद्दा भी सुनवाई के दौरान सामने आया। इसके अलावा, बाद में पेश की गई विस्तृत रिपोर्ट का भी परीक्षण हुआ। हाई कोर्ट ने रिपोर्ट के सीमित नमूने और तुलनात्मक आधार की कमी को ध्यान में रखते हुए उसे 27 प्रतिशत आरक्षण के समर्थन में पर्याप्त ठोस आधार नहीं माना।

हाई कोर्ट ने यह निष्कर्ष निकाला
हाई कोर्ट ने आरक्षण देने के अधिकार और उसके प्रतिशत में वृद्धि के औचित्य के बीच अंतर किया। अदालत ने उपलब्ध सामग्री के आधार पर सरकारी सेवाओं में ओबीसी वर्ग के प्रतिनिधित्व को पर्याप्त माना और आरक्षण की सीमा 27 प्रतिशत तक बढ़ाने के लिए आवश्यक असाधारण परिस्थितियां स्थापित नहीं पाईं।

निर्णय में 14 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण की व्यवस्था कायम रखी गई। साथ ही, निर्धारित अवधि में 14 प्रतिशत से अधिक आरक्षण के आधार पर नियुक्त किए गए कुछ ओबीसी अभ्यर्थियों की नियुक्तियों को सुरक्षा प्रदान की गई। रोके गए 13 प्रतिशत पदों पर अनारक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को तीन महीने के भीतर नियुक्त करने के निर्देश भी दिए गए।

इस तरह हाई कोर्ट के फैसले में सामाजिक न्याय के उद्देश्य, पिछड़े वर्गों के प्रतिनिधित्व और आरक्षण की संवैधानिक सीमाओं के बीच संतुलन का सवाल केंद्र में रहा। अदालत ने आरक्षण बढ़ाने के लिए ठोस आंकड़ों और असाधारण परिस्थितियों की आवश्यकता पर जोर देते हुए 27 प्रतिशत आरक्षण की मांग को स्वीकार नहीं किया।