August 25, 2026

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BJP जॉइन करने पर पिता ने जूतों से पीटा था, 15 साल बाद बासित बने पार्टी का मुस्लिम चेहरा

 

 नई दिल्ली
   
राजनीति की राह कभी भी आसान नहीं होती, लेकिन जब विचार और पहचान की धाराएं विपरीत दिशा में बह रही हों, तो वह राह सिर्फ राजनीति नहीं रह जाती, बल्कि एक बड़ा सामाजिक संघर्ष बन जाती है. बीजेपी का झंडा उठाकर मुस्लिम समाज के बीच राजनीति करना कुंवर बासित अली के लिए आसान नहीं था. जब चुनौतियां अपनों और समाज की पुरानी सोच से शुरू होती हैं, तो वह सफर एक आम राजनीतिक यात्रा नहीं बल्कि एक बड़ा संघर्ष बन जाता है। 

मेरठ के छोटे से गांव कायस्थ बड्ढा से निकलकर भारतीय जनता पार्टी के अल्पसंख्यक मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद तक का सफर तय करने वाले कुंवर बासित अली की कहानी कुछ ऐसी ही तपिश में ढली है. घर के आंगन से उठी असहमति की आवाजों से लेकर मुस्लिम समाज के तानों के बीच कुंवर बासित अली ने अपने सियासी कदम बीजेपी की राजनीति से कभी पीछे नहीं खींचे। 

बीजेपी में कदम रखते ही बासित अली को अपने पिता हामिद अली से सिर्फ बात ही नहीं सुनी पड़ी बल्कि जूते और लाठियों से मार भी खानी पड़ी. इसके बावजूद बासित अली ने अपना रास्ता नहीं बदला. 15 साल पहले बीजेपी कार्यकर्ता के तौर अपनी राजनीतिक पारी का आगाज किया और अब पार्टी के सबसे बड़े मुस्लिम चेहरा बनकर उभरे हैं। 

मुस्लिम समाज के बीच करना पड़ा संघर्ष
कुंवर बासित अली के राजनीतिक सफर की शुरुआत ही सबसे मुश्किल पड़ाव से हुई थी. जब 2011 में उन्होंने भाजपा से जुड़ने का फैसला किया, तो सबसे पहली और सबसे बड़ी दीवार खुद उनके घर और मुस्लिम समाज के भीतर खड़ी हुई. 15 साल पहले किसी मुस्लिम के लिए भाजपा का झंडा उठाना आम बात नहीं थी. उस समय मुस्लिम समुदाय के लोग भाजपा का नाम सुनते ही नाक-भौं सिकोड़ने लगते थे। 

नितिन नवीन और बासित अली
मुस्लिम समाज का एक बड़ा हिस्सा परंपराओं के ढांचे से बाहर निकलने पर सवाल उठाने लगा था. लेकिन तानों और सामाजिक दबाव की परवाह किए बिना उन्होंने अपने इरादों को डिगने नहीं दिया. भाजपा से जुड़ने के बाद बासित अली को रिश्तेदारों की खामोशी, पड़ोसियों की चुभती निगाहें और समाज से अलग-थलग किए जाने का अघोषित डर हर रोज़ सताता था. भाजपा में शामिल होने के बाद जब भी वह घर से बाहर निकलते, तो दोस्त और रिश्तेदार तंज कसते थे, "किस राह पर निकल पड़े हो?

अल्पसंख्यक मोर्चा अध्यक्ष कुंवर बासित अली
सियासत में कदम रखते ही उन्हें न केवल विरोधियों की तीखी रणनीतियों से जूझना पड़ा, बल्कि अपनी विचारधारा और काम को साबित करने के लिए दोगुनी मेहनत भी करनी पड़ी. मुस्लिम समुदाय की नाराजगी, ज़मीनी स्तर पर लोगों को जोड़ने की चुनौती और हर मोड़ पर उठते सवालों के बावजूद उन्होंने जनता से सीधा संवाद बनाए रखा. विपक्षी दल उन्हें और उनके जैसे कार्यकर्ताओं को 'राजनीतिक ढाल' कहकर तंज कसते थे. ऐसे में बासित अली के सामने अपनी वफादारी और अपनी पहचान दोनों को एक साथ साबित करने की बड़ी चुनौती थी। 

भाजपा में शामिल होते ही पिता ने की थी पिटाई
कुंवर बासित अली ने 15 साल पहले 2011 में जब राजनीति में आने का फैसला किया, तो उन्होंने भाजपा को चुना. वर्ष 2011 में जब वे भाजपा में शामिल हुए, तो मेरठ के पूर्व सांसद राजेंद्र अग्रवाल ने उन्हें पार्टी की सदस्यता दिलाई थी. बासित अली के पिता हामिद अली गांव के प्रधान थे और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) से जुड़े हुए थे। 

बासित अली के भाजपा में शामिल होने की खबर अगले दिन अखबार में छपी, जिसे पढ़ते ही उनके पिता बेहद नाराज हो गए. गुस्से में चिल्लाते हुए पिता हामिद अली ने बासित की जूते से पिटाई कर दी. उन्हें पारिवारिक व सामाजिक स्तर पर कड़ा विरोध झेलना पड़ा और लाठियां तक खानी पड़ीं। 
बासित अली बताते हैं कि 2012 के विधानसभा चुनाव का माहौल था. उनके पिता गांव के प्रधान थे और बसपा से जुड़े हुए थे. उनके सियासी संबंध बसपा नेता मुनकाद अली और हाजी याकूब कुरैशी से थे, जिसके चलते घर पर आए दिन बसपा की बैठकें हुआ करती थीं. इसी कड़ी में एक दिन उनके घर पर बसपा का कार्यक्रम तय था, लेकिन उसी दिन भाजपा ने भी जय पाल सिंह का कार्यक्रम उनके घर पर रख दिया। 

बासित ने जिलाध्यक्ष से बहुत कहा कि यह कार्यक्रम आज के बजाय किसी और दिन रख दिया जाए, लेकिन वे तैयार नहीं हुए. सुबह पिता ने घर पर बसपा का कार्यक्रम कराया और मुनकाद अली के साथ किठौर विधानसभा क्षेत्र में प्रचार के लिए निकल गए। 

बसपा के कार्यक्रम के बाद उसी दिन शाम को उसी स्थान पर भाजपा का कार्यक्रम आयोजित हुआ.जब इस बात की खबर उनके पिता को हुई, तो उन्होंने लाठियों से बासित अली की पिटाई कर दी. पिता के डर की वजह से बासित अली घर से भाग गए और जंगल में स्थित ईदगाह में रात गुजार, इसके बाद वे दो महीने तक अपने घर वापस नहीं आए. बाद में बासित अली के बहनोई बीच में पड़े और उन्हें घर वापस लेकर आए। 

बीजेपी का प्रचार करते बासित को सुनना पड़ा ताना
2012 के चुनाव के दौरान ही बासित अली किठौर विधानसभा क्षेत्र में भाजपा नेता जय पाल सिंह के साथ रोड शो कर रहे थे. दोनों एक ही रथ पर सवार थे., बाजार में जब उन्हें प्चार करते हुए पिता हामिद अली ने देखा, तो उन्होंने सरेबाजार लाठियों से मारना शुरू कर दिया। 

उस समय बासित भाजपा के रथ से उतरकर भाग गए, लेकिन इसके बाद उन्होंने घर पर बैठकर पिता से बात की और साफशब्दों में कहा कि वे किसी भी सूरत में भाजपा नहीं छोड़ेंगे. बासित अली बताते हैं कि उस दिन के बाद से उनके पिता ने कभी कुछ नहीं कहा और खुद भी बसपा से दूरी बना ली. यहीं से बासित अली के हौसले को उड़ान मिली और इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। 

बासित अली का फर्श से अर्श तक का सफर
तमाम विरोधों और चुनौतियों के बावजूद बासित अली ने अपना रास्ता नहीं बदला. उन्होंने पार्टी के लिए ज़मीनी स्तर पर काम करना जारी रखा. भाजपा युवा मोर्चा और फिर अल्पसंख्यक मोर्चा से जुड़कर उन्होंने मेरठ में काम शुरू किया. उनका दिन-रात का संघर्ष धीरे-धीरे रंग लाने लगा। 

कुंवर बासित अली ने लोगों के बीच रहकर उनकी समस्याओं को उठाया और ज़मीनी राजनीति का हिस्सा बने. समाज और परिवार के जिस विरोध से उनका सफर शुरू हुआ था, वही विरोध उनके अडिग संकल्प के आगे धीरे-धीरे समर्थन और विश्वास में बदलने लगा। 

 बासित अली पहले जिला सह-मीडिया प्रभारी बने और फिर 2012 में अल्पसंख्यक मोर्चा के जिलाध्यक्ष नियुक्त हुए. इसके साथ ही उन्होंने मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के क्षेत्रीय संयोजक का दायित्व भी संभाला. वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान जब उत्तर प्रदेश के मेरठ में नरेंद्र मोदी की पहली चुनावी रैली तय हुई, तो बासित अली ने उन्हें प्रधानमंत्री बनाने के लिए मुस्लिम समुदाय से दुआ कराने का विशेष कार्यक्रम आयोजित किया, जिससे वे राजनीतिक सुर्खियों में आए। 

केंद्र में मोदी सरकार के बनने के बाद 2014 में ही भाजपा का सदस्यता अभियान शुरू हुआ, तो पहले ही दिन मेरठ में 2,500 से अधिक मुस्लिमों को पार्टी से जोड़कर वे संगठन में चर्चा का केंद्र बन गए. उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार बनने के बाद उन्हें राज्य उर्दू अकादमी का सदस्य बनाया गया, जिससे उर्दू भाषा और साहित्य से जुड़े मुद्दों पर उनकी समझ को संगठन में महत्व मिला। 

बासित अली अपनी सांगठनिक जिम्मेदारियों के साथ-साथ ज़मीनी स्तर पर भी सक्रिय रहे. उन्होंने अपने स्तर पर मदरसों में योग को बढ़ावा देने और 'मोदी मित्र' जैसी योजनाओं को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई. इसके बाद उन्हें यूपी अल्पसंख्यक मोर्चा का प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया गया। 

यूपी अल्पसंख्यक मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष रहते हुए कुंवर बासित अली ने मुस्लिम बहुल इलाकों में पार्टी संगठन को सक्रिय करने और सरकार की कल्याणकारी योजनाओं को समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने का काम किया. अब उन्हें राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाकर पार्टी नेतृत्व ने उनके सांगठनिक कौशल पर भरोसा जताया है और युवाओं को जोड़ने की बड़ी जिम्मेदारी सौंपी है। 

संघर्ष से सम्मान तक की सियासी यात्रा
बासित अली ने अपने सामने आई मुश्किलों का जवाब तर्कों से नहीं, बल्कि ज़मीनी मेहनत से दिया. उन्होंने बूथ स्तर पर काम करना शुरू किया. एक सामान्य कार्यकर्ता से लेकर जिला सह-मीडिया प्रभारी, अल्पसंख्यक मोर्चा के जिलाध्यक्ष, प्रदेश अध्यक्ष और अब राष्ट्रीय अध्यक्ष पद तक पहुँचना आसान नहीं था.

जब बासित अली ने मदरसों में योग शिविर आयोजित कराने की पहल की या पसमांदा और मुस्लिम राजपूत समाज को जोड़ने के लिए चौपालें लगाईं, तो उन्हें अपने ही समाज के तमाम लोगों के विरोध का सामना करना पड़ा. इसके बावजूद उन्होंने घर-घर जाकर संवाद कायम रखा। 

तीन तलाक कानून और भाजपा सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थियों तक पहुंचकर उन्होंने यह साबित करने का प्रयास किया कि राजनीति पूर्वाग्रहों से परे भी हो सकती है. 15 वर्षों के निरंतर सांगठनिक कार्य और निष्ठा को देखते हुए भाजपा नेतृत्व ने उनके काम को सराहा है। 

संगठन के विस्तार और अल्पसंख्यक समुदाय के बीच पैठ मजबूत करने की रणनीति के तहत भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने बासित अली को अपनी टीम में प्रमुख मुस्लिम चेहरे के रूप में शामिल किया है. सांगठनिक पदोन्नति के तहत उन्हें भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया है, जिसकी कमान वे औपचारिक रूप से मंगलवार को संभालेंगे। 

कुंवर बासित अली की कहानी यह दर्शाती है कि राजनीति में जब धारा के विपरीत तैरना पड़े, तो सबसे बड़ी ताकत आपका अपना संकल्प होता है. अपनों का विरोध, समाज का अविश्वास और राजनीति की बिसात. इन सबको लांघकर ही एक आम कार्यकर्ता राष्ट्रीय पटल पर अपनी पहचान बना पाता है. यही कारण है कि जिस भाजपा से जुड़ने पर कभी पिता ने जूतों और लाठियों से पिटाई की थी, आज वही पिता अपने बेटे की इस ऐतिहासिक सियासी कामयाबी पर जश्न मना रहे हैं।