नई दिल्ली
सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए घर खरीदारों की बड़ी राहत दी है. कोर्ट के फैसले से उन होमबायर्स को बड़ी राहत मिली है जो दिवालिया हो चुकी हाउसिंग प्रोजेक्ट में फंसे हुए हैं. कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि ऐसे खरीदारों को उनकी संपत्ति का कब्ज़ा पाने का अधिकार है, बशर्ते उनके दावे को रेजोल्यूशन प्रोफेशनल ने वित्तीय लेनदारों की सूची में स्वीकार कर लिया हो. यह फैसला होमबायर्स के अधिकारों को सुरक्षित करता है और दिवालियापन की कार्यवाही के दौरान उनके हितों को प्राथमिकता देता है.
हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक अदालत ने यह आदेश चंडीगढ़ के एक मामले में सुनवाई करते हुए पारित किया. इस केस में, दो लोगों ने मोहाली के Ireo Rise (Gardenia) प्रोजेक्ट में 2010 में एक फ्लैट बुक किया था, उन्होंने 60 लाख की पूरी राशि का भुगतान भी कर दिया था, लेकिन 2018 में दिवालियापन की कार्यवाही शुरू होने के कारण उन्हें फ्लैट का कब्ज़ा नहीं मिल पाया.
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
कोर्ट ने इस मामले को बड़े परिप्रेक्ष्य में देखा, क्योंकि इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) की ऐसी व्याख्या उन होमबायर्स के साथ अन्याय होगी, जो समझौते के अपने हिस्से का सम्मान करने के बावजूद फ्लैट पर कब्जे का इंतजार कर रहे हैं. न्यायमूर्ति संजय कुमार और सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने कहा, "इस मामले के तथ्य उन आम होमबायर्स की दुर्दशा को उजागर करते हैं, जो अपने सिर पर छत पाने की उम्मीद में अपनी जीवन भर की बचत का निवेश करते हैं.'
अपीलकर्ताओं ने 2011 में ही लगभग पूरी राशि का भुगतान कर दिया था, उनके दावे को सही तरह से सत्यापित और स्वीकार किए जाने के बावजूद, आज उन्हें कब्जा देने से इनकार करना, उनके साथ अनुचित और अनावश्यक अन्याय होगा.
कोर्ट ने पाया कि NCLT and NCLAT ने याचिकाकर्ताओं को गलत तरीके से क्लॉज 18.4(xi) के तहत वर्गीकृत किया. यह क्लॉज उन होमबायर्स पर लागू होता है, जिन्होंने दावा नहीं किया, देर से दावा किया या जिनका दावा बिल्डर द्वारा सत्यापित नहीं किया गया. कोर्ट ने ने माना कि इस वर्गीकरण में गलतियां थीं.
कोर्ट ने बताया कि इस क्लॉज में सत्यापित दावों और देरी से या असत्यापित दावों के बीच एक स्पष्ट अंतर है, क्योंकि क्लॉज 18.4(vi)(a) उन आवंटियों के मामलों को नियंत्रित करता है जिनके दावे सत्यापित और स्वीकार कर लिए गए हैं. ये आवंटी अपने अपार्टमेंट या उसके बराबर किसी वैकल्पिक यूनिट पर कब्जा पाने के हकदार हो जाते हैं.
अपीलकर्ताओं ने 27 मई 2011 को बिल्डर के साथ समझौता किया था और लगभग 60 लाख रुपये की पूरी कीमत में से 57,56,684 रुपये का भुगतान कर दिया था. NCLAT ने अपने फैसले में कहा था कि अपीलकर्ताओं का दावा देर से आया था, क्योंकि यह उस तारीख के बाद मिला था जब 23 अगस्त 2019 को कमेटी ऑफ क्रेडिटर्स (लेनदारों की समिति) द्वारा समाधान योजना (Resolution Plan) को पहले ही मंजूरी दी जा चुकी थी. याचिकाकर्ताओं ने इसी फैसले को चुनौती देते हुए कोर्ट का रुख किया था.

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