October 13, 2026

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भारत ने भी अमेरिका को नहीं दिखाए अपने फाइटर जेट के सीक्रेट, Su-30MKI के रडार की ऐसे की सुरक्षा

 

 नई दिल्ली

तरंग शक्ति अभ्यास के दौरान अमेरिकी वायु सेना ने भारतीय अधिकारियों को F-35 स्टील्थ लड़ाकू विमान के कॉकपिट के पास भी नहीं जाने दिया. वायु सेना प्रमुख एयर मार्शल एपी सिंह ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में साफ कहा कि अमेरिकी लोग विमान के करीब भी नहीं आने देते, फिर बिक्री की बात कैसे करते हैं. उन्होंने बताया कि कॉकपिट नहीं दिखाया गया, हालांकि करीबी फॉर्मेशन में उड़ान भरने की अनुमति दी गई। अमेरिकी पैसिफिक एयर फोर्सेज कमांडर जनरल केविन श्नाइडर ने कहा कि F-35 जैसे प्रोग्राम की सुरक्षा गाइडलाइन तय करती है कि क्या और कितना शेयर किया जा सकता है. यह घटना कोई नई नहीं है। 

2008 में जब भारतीय वायु सेना ने अपने सबसे आधुनिक Su-30 MKI विमानों को अमेरिका के रेड फ्लैग अभ्यास में भेजा था, तब भारत ने भी ठीक ऐसी ही सावधानी बरती थी. दोनों घटनाएं साफ बताती हैं कि वायु सेनाएं सेंसिटिव तकनीक को कितनी गंभीरता से बचाती हैं। 

2008 के रेड फ्लैग में Su-30 MKI की सुरक्षा व्यवस्था
2008 में भारत ने नेवादा स्थित नेलिस एयर फोर्स बेस पर रेड फ्लैग अभ्यास के लिए अपने Su-30 MKI फ्लैंकर भेजे. ये विमान उस समय भारतीय वायु सेना के सबसे एडवांस फाइटर जेट थे. इनमें रूसी NIIP N011M बार्स पैसिव इलेक्ट्रॉनिकली स्कैंड अरे यानी PESA रडार लगा था। 

रक्षा मंत्रालय ने पायलटों को निर्देश दिया कि रडार को पूरा ऑपरेशनल मोड में न चलाएं. भारतीय वायु सेना ने उस समय स्पष्ट कहा था कि रडार की फ्रिक्वेंसी टॉप सीक्रेट हैं क्योंकि इनका इस्तेमाल करके विमान के महत्वपूर्ण कार्यों को जाम किया जा सकता है. अमेरिका से अच्छे संबंध होने के बावजूद भविष्य को ध्यान में रखते हुए सावधानी जरूरी है। 

इसलिए बार्स रडार को सिर्फ सीमित ट्रेनिंग मोड में चलाया गया. इस मोड में रेंज और क्षमताएं घट जाती हैं, जिससे  मेजबान पक्ष उसकी फ्रिक्वेंसी का विस्तृत नक्शा नहीं बना पाता. इसके अलावा डेटा-लिंक, चाफ, फ्लेयर और R-77 बीवीआर मिसाइल के सिमुलेशन पर भी पाबंदियां लगाई गईं. भारतीय पायलट पूर्ण कॉकपिट डेटा पिक्चर के बिना काम करते रहे ताकि संवेदनशील तकनीक सुरक्षित रहे। 

हालांकि पूरी पहुंच नहीं दी गई, फिर भी इंट्रोडक्शन स्टेज में कुछ जानकारी साझा की गई थी. Su-30 MKI क्रू ने अमेरिकी समकक्षों के साथ राइड एक्सचेंज किए. अमेरिकी पायलट फ्लैंकर के पिछले सीट पर बैठकर उड़ान भर सके. बाद के वर्षों में भी यह सिलसिला जारी रहा। 

2023 के कोप इंडिया अभ्यास में कलाईकुंडा में तब के पैसिफिक एयर फोर्सेज कमांडर जनरल केनेथ एस विल्सबैक ने भारतीय पायलट के साथ Su-30 MKI के पिछली सीट पर ट्रेनिंग मिशन के दौरान उड़ान भरी. भारतीय वायु सेना ने इसकी पुष्टि भी की. पहले के कोप इंडिया दौरों में भी अमेरिकी पायलट Su-30 ट्रेनर वेरिएंट में बैठ चुके थे।

तरंग शक्ति में F-35 को अलग क्षेत्र में रखा गया और सीमित संपर्क रहा, लेकिन अमेरिकी वायु सेना को Su-30 MKI के प्रदर्शन, रडार व्यवहार और रणनीति का काफी अनुभव मिला. दोनों पक्ष एक-दूसरे की क्षमताओं को समझ रहे थे लेकिन कोर सीक्रेट्स छिपाए रखे। 

कर्नल फॉर्नोफ के दावे और भारतीय जवाब
अभ्यास के बाद अमेरिकी कर्नल टेरेंस फॉर्नोफ का एक निजी ब्रीफिंग वीडियो इंटरनेट पर फैला. फॉर्नोफ F-15 पायलट थे. नेलिस एयर फोर्स वॉरफेयर सेंटर में रिक्वायरमेंट्स एंड टेस्टिंग के निदेशक. उन्होंने रिटायर्ड पायलटों के समूह को संबोधित करते हुए दावा किया कि F-15 पायलटों ने Su-30 MKI को एक-बनाम-एक लड़ाइयों में पूरी तरह दबा दिया।  

उन्होंने कहा कि भारतीय पायलट हैरान और हक्के-बक्के रह गए तथा शुरुआती कुछ दिनों के बाद और एक-बनाम-एक लड़ाई नहीं लड़ना चाहते थे. फॉर्नोफ के अनुसार F-15 ने थ्रस्ट-वेक्टरिंग की कमजोरी का फायदा उठाया. जब Su-30 पोस्ट-स्टॉल मैन्यूवर में जाता तो वह आसमान से गिरने लगता और F-15 गन से निपट लेता। 

उन्होंने यह भी कहा कि Su-30 के इंजन विदेशी वस्तु से नुकसान के प्रति बहुत संवेदनशील हैं इसलिए भारतीय पायलट टेकऑफ के बीच एक मिनट का अंतराल मांगते थे. फ्रैटरिसाइड यानी अपनी तरफ की गलती से मार गिराए जाने की दर ऊंची बताई गई। 

फॉर्नोफ ने माना कि कागजों पर Su-30 का रडार, थ्रस्ट, थ्रस्ट वेक्टरिंग और हथियार रेंज बेहतर है लेकिन एक बार भारतीय पायलट पूरी तरह महारत हासिल कर लें तो F-15 और F-16 को नियमित रूप से हरा सकते हैं. हालांकि Su-30 किसी भी तरह से F-22 के आसपास भी नहीं है. अमेरिकी वायु सेना ने बाद में स्पष्ट किया कि ये फॉर्नोफ की निजी राय थी. उन्होंने सहयोगियों को ठेस पहुंचाने का इरादा नहीं रखा था। 

भारतीय पक्ष का अलग बयान और वास्तविक प्रदर्शन
भारतीय खातों और बाद की रिपोर्टिंग ने फॉर्नोफ के दावों को खारिज किया. उन्होंने कहा कि सुखोई ने शीर्ष अमेरिकी पायलटों के खिलाफ अच्छा प्रदर्शन किया. पूरे अभ्यास में हाई सर्विसबिलिटी रेट बनाए रखा. एक वरिष्ठ भारतीय अधिकारी ने उस समय बताया कि हमारे पायलट अकेले काम कर रहे थे जबकि अमेरिकी पायलट नेटवर्क का हिस्सा थे और नेविगेशन, टारगेट की जानकारी तथा दुश्मन के डिटेल मिल रहे थे। 

हम सारी जानकारी मैन्युअली ले रहे थे फिर भी इन बाधाओं के बावजूद फिट रहे. भारतीय स्रोतों के अनुसार लगभग दस एक-बनाम-एक लड़ाइयों में कोई Su-30 MKI नहीं गिराया गया. ज्यादातर किल भारतीय पक्ष के नाम रहे. सभी मुठभेड़ ACMI सिस्टम पर रिकॉर्ड हुईं. थ्रस्ट-वेक्टरिंग का प्रदर्शन फॉर्नोफ के बयान से अलग था और अमेरिकी एयरक्रू ने भारतीय मैन्यूवर की सराहना की. फ्रैटरिसाइड दोनों तरफ हुए। 

भारतीय पक्ष ने इन्हें AWACS सपोर्ट न मिलने और अमेरिकी कंट्रोलर्स के खराब ग्राउंड कंट्रोल से जोड़ा, जिसकी डीब्रीफिंग में स्वीकार भी किया गया. भारतीय वायु सेना के पास Link-16 और एडवांस्ड IFF नहीं था जबकि अमेरिकी पक्ष के पास था. सर्विसबिलिटी 90% से ऊपर बताई गई. विदेशी वस्तु से नुकसान की कोई पुष्टि नहीं हुई। 

इंजन NPO सैटर्न के थे. एक मिनट का टेकऑफ अंतराल सुरक्षा उपाय था क्योंकि क्षतिग्रस्त इंजन रूस भेजने पड़ते और स्थानीय रिप्लेसमेंट उपलब्ध नहीं थे. भारतीय वायु सेना ने 90 प्रतिशत से ऊपर मिशन अचीवमेंट रेट बताया और घर से दूर तथा प्रतिबंधों के बावजूद बड़े फोर्स एंगेजमेंट में अच्छा प्रदर्शन किया। 

दोनों घटनाओं से निकलने वाला बड़ा सबक
तरंग शक्ति में F-35 की सीमित पहुंच और 2008 में Su-30 MKI पर लगाए गए प्रतिबंध एक ही सिद्धांत को दर्शाते हैं. वायु सेनाएं वॉरगेम्स के दौरान अपनी वर्गीकृत तकनीक की रक्षा करती हैं. अमेरिका अपने स्टील्थ विमान के कॉकपिट और सेंसर फ्यूजन को बचाता है तो भारत अपने बार्स रडार की फ्रिक्वेंसी और पूर्ण क्षमताओं को। 

दोनों पक्ष एक-दूसरे को उड़ान भरते हुए देखते हैं, रणनीति सीखते हैं लेकिन कोर सीक्रेट्स हाथ में नहीं आने देते. यह सामान्य प्रथा है. भविष्य में जब चीन के J-20 जैसे विमानों से मुकाबला हो सकता है तो तरंग शक्ति जैसे अभ्यास भारतीय पक्ष को स्टील्थ जेट का व्यवहार समझने का मौका देते हैं बिना उसके अंदरूनी रहस्य जाने। 

इसी तरह 2008 में अमेरिकी पक्ष ने फ्लैंकर की क्षमताओं का अनुभव लिया लेकिन पूर्ण रडार मैपिंग नहीं कर पाया. सुरक्षा और सहयोग दोनों साथ चलते हैं. तकनीक की रक्षा राष्ट्रीय हित का हिस्सा है और दोनों देश इसे समझते हैं।