नई दिल्ली
राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह चुने गई हैं. इतिहास में यह पहली बार है जब किसी को भी लगातार तीसरी बार बिना किसी विरोध के राज्यसभा का उपसभापति चुना गया है. इस दौरान प्रधानमंत्री मोदी खुद मौजूद थे. राजनीति में कई बार ऐसे मौके आते हैं जब सत्ता और विपक्ष के बीच टकराव की जगह सहमति नजर आती है. राज्यसभा के उपसभापति पद का चुनाव ऐसा ही एक पल लेकर आया, जहां बिना किसी मुकाबले के फैसला हो गया. हरिवंश नारायण सिंह का लगातार तीसरी बार इस पद पर चुना जाना सिर्फ एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि सदन की कार्यशैली और राजनीतिक समीकरणों का संकेत भी है. दिलचस्प यह रहा कि इस अहम मौके पर नरेंद्र मोदी खुद सदन में मौजूद रहे, जिससे इस चुनाव की अहमियत और बढ़ गई।
बिना विपक्षी उम्मीदवार के चुनाव जीतना किसी भी संसदीय प्रक्रिया में एक खास स्थिति होती है. यह या तो राजनीतिक रणनीति का हिस्सा होता है या फिर सहमति की मजबूरी. इस बार भी ऐसा ही देखने को मिला, जब विपक्ष ने कोई नामांकन दाखिल नहीं किया और राज्यसभा में उपसभापति का चुनाव लगभग तय हो गया. इससे यह भी साफ हुआ कि मौजूदा राजनीतिक माहौल में सत्ता पक्ष की पकड़ मजबूत बनी हुई है।
तीसरी बार उपसभापति बने हरिवंश, विपक्ष ने नहीं उतारा उम्मीदवार
हरिवंश नारायण सिंह को राज्यसभा का उपसभापति तीसरी बार चुना गया है. उन्हें इस बार निर्विरोध चुना गया, क्योंकि विपक्ष की ओर से कोई भी उम्मीदवार मैदान में नहीं उतरा. निर्धारित समय सीमा तक कोई नामांकन नहीं आने के कारण उनका चयन लगभग तय हो गया था।
इस चुनाव के लिए कुल पांच प्रस्ताव दाखिल किए गए थे. इनमें जगत प्रकाश नड्डा, निर्मला सीतारमण और अन्य वरिष्ठ नेताओं ने उनका नाम आगे बढ़ाया. यह प्रस्ताव विभिन्न दलों के नेताओं द्वारा समर्थित थे, जिससे उनकी उम्मीदवारी को व्यापक समर्थन मिला।
संसदीय परंपरा के अनुसार, इन प्रस्तावों को सदन में पेश किया जाएगा और वॉइस वोट के जरिए मंजूरी दी जाएगी. एक प्रस्ताव के पारित होते ही बाकी प्रस्ताव स्वतः समाप्त हो जाते हैं. ऐसे में यह प्रक्रिया औपचारिकता भर रह जाती है, लेकिन इसकी राजनीतिक अहमियत कम नहीं होती।
इससे पहले हरिवंश नारायण सिंह को 2018 में पहली बार इस पद के लिए चुना गया था और 2020 में उन्हें दूसरी बार मौका मिला. अब तीसरी बार इस पद पर उनकी वापसी उनके अनुभव और स्वीकार्यता को दर्शाती है।
हरिवंश नारायण सिंह एक बार फिर राज्यसभा के सदस्य बने हैं. शुक्रवार को उन्होंने बतौर राज्यसभा सांसद शपथ ली. बीते कई वर्षों से हरिवंश नारायण सिंह राज्यसभा के उपसभापति रहे हैं. उनका कार्यकाल पूरा होने पर उन्हे राज्यसभा के लिए नॉमिनेट किया गया है. केंद्रीय गृह मंत्रालय ने एक अधिसूचना जारी कर इसकी जानकारी दी थी।
मनोनीत किए जाने के उपरांत शुक्रवार को उन्होंने राज्यसभा सदस्य के तौर पर शपथ ली. राज्यसभा में यह उनका तीसरा कार्यकाल है. प्रख्यात पत्रकार रहे हरिवंश का यह नया कार्यकाल वर्ष 2032 तक चलेगा. शुक्रवार को सामने आई अधिसूचना में बताया गया था कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 80 के खंड (3) के साथ पठित खंड (1) के उपखंड (क) के तहत मिली शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए राष्ट्रपति ने हरिवंश को राज्यसभा के लिए नामित किया है. पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के राज्यसभा से हाल ही में रिटायर होने के बाद संसद के उच्च सदन में यह एक सीट खाली हो हुई थी।
गौरतलब है कि संविधान के अनुसार राष्ट्रपति राज्यसभा में 12 सदस्यों को नामित या मनोनीत कर सकती हैं. राज्यसभा के ये सदस्य साहित्य, विज्ञान, कला और समाज सेवा जैसे क्षेत्रों में विशेष ज्ञान या अनुभव के आधार पर मनोनीत किए जाते हैं. इससे पहले नीतीश कुमार की जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) ने हरिवंश नारायण सिंह राज्यसभा सांसद बनाया था. लेकिन इस बार जेडीयू ने उन्हें उम्मीदवार नहीं बनाया और हरिवंश को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु द्वारा राज्यसभा सांसद मनोनीत किया गया।
राज्यसभा में हरिवंश का कार्यकाल 9 अप्रैल को खत्म हो चुका था. 10 अप्रैल से उनका नया कार्यकाल शुरू हुआ है. हरिवंश को पहली बार जेडीयू ने अप्रैल 2014 में बिहार से पहली बार राज्यसभा में भेजा था. 9 अगस्त 2018 को उन्हें राज्यसभा का उपसभापति बनाया गया. गौरतलब है कि शुक्रवार को ही नीतीश कुमार ने भी राज्यसभा सदस्य के रूप में शपथ ली. नई दिल्ली में राज्यसभा के सभापति व उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने उन्हें राज्यसभा सांसद के तौर पर शपथ दिलाई।
इस मौके पर राज्यसभा में नेता सदन व केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन, कांग्रेस के जयराम रमेश, जेडीयू व भाजपा नेता मौजूद रहे. नीतीश कुमार के इस शपथग्रहण के साथ ही बिहार की सियासत में भी एक ऐतिहासिक बदलाव की शुरुआत हो गई है।
गौरतलब है कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार राज्य विधान परिषद के सदस्य थे. लेकिन राज्यसभा के लिए निर्वाचन के बाद उन्होंने 30 मार्च को विधान परिषद की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था. नीतीश कुमार बीते मार्च महीने में संसद के उच्च सदन के लिए बिहार से निर्वाचित हुए थे।
हरिवंश नारायण सिंह का निर्विरोध चुना जाना क्या दर्शाता है?
यह दिखाता है कि सदन में उनके प्रति व्यापक स्वीकार्यता है. जब विपक्ष उम्मीदवार नहीं उतारता, तो इसका मतलब होता है कि या तो वह मुकाबले की स्थिति में नहीं है या फिर वह इस पद को लेकर सहमति बनाना चाहता है. यह राजनीतिक रणनीति का हिस्सा भी हो सकता है, जहां विपक्ष किसी बड़े मुद्दे पर फोकस रखना चाहता है. और लगातार तीसरी बार चुना जाना अपने आप में इतिहास है।
उपसभापति का पद कितना महत्वपूर्ण होता है?
राज्यसभा के उपसभापति का पद बेहद अहम होता है. यह व्यक्ति सभापति की अनुपस्थिति में सदन की कार्यवाही चलाता है. सदन में अनुशासन बनाए रखना, बहस को सुचारु रूप से आगे बढ़ाना और नियमों का पालन सुनिश्चित करना इसकी जिम्मेदारी होती है. इसलिए इस पद पर अनुभवी और संतुलित व्यक्ति का होना जरूरी माना जाता है।
क्या इस चुनाव में कोई राजनीतिक संदेश छिपा है?
हां, यह चुनाव कई संकेत देता है. एक तरफ यह सत्ता पक्ष की मजबूती को दिखाता है, तो दूसरी तरफ विपक्ष की रणनीति को भी उजागर करता है. बिना मुकाबले के चुनाव होना यह भी दर्शाता है कि फिलहाल इस मुद्दे पर विपक्ष आक्रामक रुख अपनाने के बजाय दूरी बनाए रखना चाहता है।

More Stories
TCS नासिक कांड में बड़ा खुलासा, मास्टरमाइंड निदा खान प्रेग्नेंट, गिरफ्तारी से बचने के लिए खेला नया दांव
ईरान युद्ध के बीच अरब सागर में भारत का एक्शन, 400 किलोमीटर तक नो फ्लाई जोन घोषित, पाकिस्तान में हलचल
महिला आरक्षण बिल अटका: लोकसभा में संख्या नहीं जुटा पाई सरकार, 298 वोट पर सिमटा समर्थन