नई दिल्ली. खाड़ी क्षेत्र में चल रहा संघर्ष, जिसमें इजरायल, ईरान और अमेरिका से जुड़े सैन्य ठिकाने शामिल हैं, वैश्विक अर्थव्यवस्था पर बड़ा असर डाल सकता है। शनिवार को जारी एसबीआई रिसर्च की एक रिपोर्ट के अनुसार, यदि यह संघर्ष लंबा चलता है तो इससे वैश्विक मंदी का दबाव, महंगाई में वृद्धि और वित्तीय बाजारों में अस्थिरता बढ़ सकती है। हालांकि रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत के घरेलू वित्तीय बाजारों को फिलहाल भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के कदमों से सपोर्ट मिला है। आरबीआई ने सरकारी बॉन्ड (जी-सेक) यील्ड को संतुलित रखने और रुपए की अस्थिरता को नियंत्रित करने के लिए हस्तक्षेप किया है। रिपोर्ट के मुताबिक, अगर यह संघर्ष लंबे समय तक जारी रहता है तो इससे भारत के मैक्रो-इकोनॉमिक संकेतकों पर भी दबाव पड़ सकता है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि आरबीआई ने स्पॉट मार्केट में हस्तक्षेप करके रुपए की अधिक अस्थिरता को कम किया है और इसे 92 के स्तर से नीचे रखने में सफलता हासिल की है। रिपोर्ट के अनुसार, मौजूदा अनिश्चितता के बीच यह कदम काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने से वैश्विक ऊर्जा बाजार पर असर पड़ा है। दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत कच्चे तेल का व्यापार इसी मार्ग से होता है, इसलिए यहां बाधा आने से तेल की कीमतों में तेजी देखी जा रही है। फिलहाल ब्रेंट क्रूड की कीमत 91.84 डॉलर प्रति बैरल और डब्ल्यूटीआई 89.62 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच चुकी है।
एसबीआई रिसर्च के अनुसार, अगर कच्चे तेल की कीमत में प्रति बैरल 10 डॉलर की बढ़ोतरी होती है, तो वित्त वर्ष 2027 में चालू खाते का घाटा (सीएडी) करीब 36 बेसिस प्वाइंट तक बढ़ सकता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि तेल की कीमत 130 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच जाती है, तो भारत की जीडीपी वृद्धि दर घटकर लगभग 6 प्रतिशत तक आ सकती है। एसबीआई रिसर्च ने ऐतिहासिक दृष्टिकोण से भी इस संघर्ष का विश्लेषण किया है। रिपोर्ट के अनुसार, यह युद्ध कोंड्राटिएफ वेव के अंतिम चरण के दौरान हो रहा है, जो लंबे समय तक चलने वाले आर्थिक चक्र का सिद्धांत है। इससे वैश्विक अर्थव्यवस्था पर संरचनात्मक प्रभाव पड़ सकते हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, इस संघर्ष में कुछ देशों को फायदा भी हो सकता है। उदाहरण के लिए, अमेरिका को तेल और गैस की कीमतें बढ़ने से लाभ मिल सकता है। साथ ही, यूरोप की रूसी ऊर्जा पर निर्भरता कम होने से अमेरिका के लिए नए अवसर बन सकते हैं। वहीं, दुनिया के अधिकांश अन्य क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियों पर दबाव बढ़ सकता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि बाजार में बढ़ती अस्थिरता के बीच कई केंद्रीय बैंक सुरक्षित निवेश के तौर पर सोने का भंडार बढ़ा रहे हैं। भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में फिलहाल लगभग 17.6 प्रतिशत हिस्सा सोने का है।
रिपोर्ट के अनुसार, इस संघर्ष का असर भारत पर कई तरीकों से पड़ सकता है। इसमें खाड़ी देशों से आने वाली रेमिटेंस, कच्चे तेल का आयात और पश्चिम एशियाई देशों के साथ व्यापार शामिल हैं। हालांकि रूसी कच्चे तेल की खरीद और फॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट्स जैसे कदमों के कारण आपूर्ति से जुड़े जोखिम कुछ हद तक कम हो सकते हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारतीय बैंक और निजी कंपनियां भी उन क्षेत्रों से जुड़ी हैं जो इस संघर्ष से प्रभावित हो सकते हैं।
रिपोर्ट में यह निष्कर्ष निकाला गया कि खाड़ी क्षेत्र में बढ़ती अनिश्चितता तेल की कीमतों, महंगाई की उम्मीदों और निवेशकों के भरोसे को आने वाले समय में प्रभावित करती रहेगी। इसलिए नीति निर्माताओं और निवेशकों को इस स्थिति पर करीबी नजर बनाए रखने की जरूरत है।

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