नई दिल्ली
सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज जस्टिस यशवंत वर्मा को बड़ा झटका दिया है। शीर्ष अदालत ने अधजली नकदी मामले में महाभियोग प्रस्ताव पर उनके खिलाफ आरोपों की जांच कर रहे संसदीय पैनल के खिलाफ उनकी याचिका खारिज कर दी है। इस याचिका में उन्होंने लोकसभा स्पीकर द्वारा उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए बनाई गई संसदीय समिति की वैधता को चुनौती दी थी।
जस्टिस वर्मा ने समिति के गठन पर यह कहते हुए सवाल उठाया था कि उन्हें हटाने का प्रस्ताव राज्यसभा के उपसभापति ने खारिज कर दिया था। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एससी शर्मा की बेंच ने 8 जनवरी, 2026 को इस याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। अब कोर्ट ने इस अर्जी को खारिज कर दिया है, जिससे संसदीय समिति को आगे बढ़ने की इजाजत मिल गई है।
जजेज इन्क्वायरी एक्ट के तहत जांच समिति
16 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस वर्मा की दायर याचिका पर सुनवाई करने का फैसला किया था। इस याचिका में लोकसभा स्पीकर के उस कदम को चुनौती दी गई थी जिसमें उन्होंने जजों (जांच) एक्ट के तहत "एकतरफा" तरीके से उनके खिलाफ जांच के लिए एक कमेटी बनाई थी। सीनियर एडवोकेट मुकुल रोहतगी ने कोर्ट में जस्टिस वर्मा का प्रतिनिधित्व करते हुए कहा था कि 1968 के एक्ट की धारा 3(2) के तहत कमेटी का गठन कानून द्वारा समान रूप से व्यवहार किए जाने और सुरक्षा पाने के उनके अधिकार का उल्लंघन करता है। उन्होंने तर्क दिया कि हालांकि संसद के दोनों सदनों में उसी दिन हटाने के प्रस्ताव के नोटिस दिए गए थे, लेकिन स्पीकर ने एकतरफा तरीके से कमेटी का गठन किया। पिछली सुनवाई पर यानी 8 जनवरी को अदालत ने इस पर फैसला सुरक्षित रख लिया था।
पिछले साल अगस्त में लोकसभा अध्यक्ष ने बनाई थी कमेटी
बता दें कि अगस्त 2025 में लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने सदन में महाभियोग प्रस्ताव आने के बाद जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यों वाले पैनल की घोषणा की थी। इस तीन सदस्यीय पैनल में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अरविंद कुमार, मद्रास हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस मनिंदर मोहन और सीनियर एडवोकेट बीवी आचार्य शामिल हैं।
मामला क्या?
यह पैनल जस्टिस वर्मा के आवास से भारी मात्रा में अधजली नोटों के मिलने के बाद उनके खिलाफ लाए गए महाभियोग प्रस्ताव के बाद गठित की गई थी।पिछले साल मार्च में, दिल्ली में जस्टिस वर्मा के सरकारी आवास पर लगी भीषण आग के बाद, कैश के बंडल मिले थे, जिनमें से कुछ 1.5 फीट से भी ज़्यादा ऊंचे थे। तत्कालीन चीफ जस्टिस ने इस घटना का संज्ञान लिया था और जस्टिस वर्मा का ट्रांसफर दिल्ली हाई कोर्ट से इलाहाबाद हाई कोर्ट कर दिया था।

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